सीधी। मध्य प्रदेश के सीधी जिले के आदिवासी अंचल स्थित ग्राम पंचायत बकवा की पहचान अब तेजी से बदल रही है। जिस गांव को कभी अत्यधिक पलायन के लिए जाना जाता था, आज वहां लोककला और पारंपरिक संस्कृति के दम पर 75 प्रतिशत से अधिक पलायन पर रोक लग चुकी है। गांव के निवासी अपनी सदियों पुरानी परंपराओं, लोकनृत्यों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों को ही आजीविका का मुख्य साधन बना चुके हैं। गुड़ुम्ब बाजा, कर्मा, शैला, अहिराई लाठी, चमराई लाठी, सुआ और कजली जैसे नृत्यों के माध्यम से बकवा की कला समिति मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर सम्मानजनक पारिश्रमिक अर्जित कर रही है।
🏕️ 90 वर्ष के बुजुर्गों से सीख रहे युवा, संजय टाइगर रिजर्व के होमस्टे से जोड़ने की तैयारी: पर्यटन से मिलेगा नियमित रोजगार
बकवा गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां 90 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग कलाकार आज भी पूरी सक्रियता से कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, और युवा पीढ़ी अपने पूर्वजों से यह विरासत सीख रही है। 18 वर्ष की उम्र में पलायन कर चुके 25 वर्षीय दानबहादुर घासी और अपनी सास-ससुर से कर्मा नृत्य सीख चुकीं 45 वर्षीय बुधनी देवी जैसी कई मिसालें गांव में मौजूद हैं। सीधी कलेक्टर विकास मिश्रा के अनुसार, बकवा की इस कला को पर्यटन और आजीविका से स्थायी रूप से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। संजय टाइगर रिजर्व से सटे गांवों में बने होमस्टे में ठहरने वाले देशी और विदेशी पर्यटकों के लिए शाम को इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कराया जाएगा, जिससे कलाकारों को नियमित आय और स्थानीय पर्यटन को नई पहचान मिलेगी।


