मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत उदाहरण है. यहां की हर इमारत अपने भीतर किसी न किसी युग की कहानी समेटे हुए है. इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में धार स्थित भोजशाला भी शामिल है जो केवल पत्थरों से बनी एक संरचना नहीं बल्कि भारतीय ज्ञान, शिक्षा और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक मानी जाती है. कभी यह स्थान मां सरस्वती की आराधना और विद्या अध्ययन का विश्वविख्यात केंद्र रहा तो समय के साथ यह आस्था, इतिहास और विवाद का संगम भी बन गया. एक बार फिर भोजशाला चर्चा के केंद्र में है, ऐसे में इसके गौरवशाली अतीत और वर्तमान स्वरूप को जानना बेहद जरूरी हो जाता है.
मालवा ऐतिहासिक धरोहरों से भरा हुआ है. इसी कड़ी में धार में स्थित भोजशाला भी भारतीय संस्कृति का झंडा बुलंद करती है. यह आज केवल एतिहासिक इमारत ही नहीं बल्कि प्राचीन शिक्षा, कला और संस्कृति का प्रतीक है. मां सरस्वती को समर्पित भोजशाला में एक समय में दुनिया भर से आए विद्वान ज्ञान प्राप्ति के लिए आते थे.
भोजशाला का निर्माण परमार वंश के महान राजा राजा भोज ने 1034 ईस्वी के आसपास किया था. वह एक महान योद्धा के साथ ही कला साहित्य और विज्ञान के संरक्षक भी थे. उन्होंने ही यहां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की मूर्ति स्थापित की थी. उस समय यह एक शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुका था. जहां दुनिया भर से लोग व्याकरण और खगोल विज्ञान पढ़ने आते है.
वाग्देवी की यही प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है. कहा जाता है कि 1875 के आसपास खुदाई के दौरान यहां से सरस्वती माता की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा मिली थी. जिसे एक अंग्रेज अफसर मेजर किनकैड अपने साथ लंदन ले गया. लंबे समय इसे वहां से वापस लाकर भोजशाला में ससम्मान स्थापित करने की मांग की जा रही है. भोजशाला विवाद के दौरान भी यही मूर्ति इसका सबसे बड़ा प्रमाण बनती है.
दरअसल खिलजी के धार पर आक्रमण कर भोजशाला को काफी नुकसान पहुंचाया था. इसके बाद मुस्लिम शासकों ने इसके ढांचे में भी कई बदलाव किए. 15 सी सदी के आसपास मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने यहां कुछ उसको मस्जिद के रूप में भी इस्तेमाल किया था. उसी दौरान यहां कुछ दरगाह और मस्जिद भी बनाई गई. मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला की मस्जिद मानता है. बसंत पंचमी पर यहां भव्य आयोजन होते रहे हैं जबकि कईं बार विवाद की स्थिति भी बन चुकी है.
धार में पहले कई बार धार्मिक तनाव रह चुका है. लेकिन धार्मिक गुरु और प्रशासन की सहमति से अब सब कुछ शांत वातावरण में होता है. भोजशाला में पूजा और नमाज दोनों होते है. मंगलवार को हिंदू पूजा करते है जबकि शुक्रवार को मुस्लिम नमाज पढ़ते है. बाकी दिनों के लिए यह स्थल पर्यटकों के लिए खुला रहता है. यहां बड़ी संख्या में पुरानी मूर्तियां और कलाकृति देखने को मिलती है.
भोजशाला की बनावट देखते ही आपको उस समय की हिंदू संस्कृति और कलाकृति की झलक मिलती है. यहां के खंभों पर संस्कृत में कई शिलालेख खुदे हुए है. जिनमें व्याकरण और काव्य के नियम लिखे गए है. दीवारों पर परमार काली मूर्तियां, श्लोक और संरचनाएं दिख जाती है. भोजशाला काफी बड़े क्षेत्र में फैली हुई है जानकार मानते है कि इसकी संरचना किसी मस्जिद जैसी नहीं बल्कि एक पारंपरिक भारतीय पाठशाला या मंदिर जैसी है.
एक बार फिर वसंत पंचमी से पहले भोजशाला का मुद्दा गरमा गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 2024 में ही यहां वैज्ञानिक सर्वे करने के बाद अपनी रिपोर्ट बनाई है. इस सर्वे का मकसद यह पता लगाना था कि मौजूदा ढांचे के नीचे क्या कोई मंदिर के अवशेष मौजूद है. फिलहाल इस सर्वे की रिपोर्ट आना बाकि है. अगर आप भी भोजशाला जाना चाहते है तो मंगलवार और शुक्रवार छोड़कर कभी भी जाकर इसके इतिहास को और करीब से देख सकते हैं.
















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