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पितृपक्ष में गूंजेगा त्रिपिंडी श्राद्ध, काशी में लाखों लोग करेंगे पितरों का तर्पण… जानें क्यों खास है यह अनुष्ठान

Bhavesh Nahar by Bhavesh Nahar
September 4, 2025
in धार्मिक

पितृपक्ष का समय हिन्दू धर्म में पूर्वजों को स्मरण और तर्पण का विशेष अवसर माना जाता है. पंचांग के अनुसार, इस बार पितृपक्ष 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर 2025 तक चलेगा और इस दौरान काशी में लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराएंगे. खास बात यह है कि इस बार पितृपक्ष 14 दिनों का होगा क्योंकि मलमास के कारण हर तीन साल पर इसकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. पिशाच मोचन कुंड, जिसे विमलोदक कुंड के नाम से भी जाना जाता है, अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है. स्कंद पुराण में वर्णित यह कुंड, माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव के गण कपर्दिश्वर ने बनवाया था. इसकी प्राचीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह गंगा नदी से भी पुराना माना जाता है.

त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है और क्यों है यह इतना खास?

त्रिपिंडी श्राद्ध एक ऐसा विशेष अनुष्ठान है जो तीन वर्षों तक श्राद्ध न मिलने के कारण उत्पन्न हुए पितृ दोष को दूर करने के लिए किया जाता है. पिशाच मोचन के महंत प्रदीप पाण्डेय के अनुसार, पितृ दोष के कारण जीवन में कई तरह की बाधाएं, जैसे- गृह क्लेश, अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएं और अन्य विकट समस्याएं आती हैं. इस अनुष्ठान के माध्यम से इन समस्याओं से मुक्ति पाने का प्रयास किया जाता है. इस अनुष्ठान में तीन घंटे की पूजा होती है, जिसमें स्नान, ध्यान और दान जैसी क्रियाएं शामिल हैं. पूजा के दौरान चावल, जौ और तिल के आटे से पिंड बनाए जाते हैं और त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा की जाती है. इस पूजा का मुख्य उद्देश्य पितरों को संतुष्ट करना और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करना है.

त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान स्थल

त्रिपिंडी श्राद्ध का अनुष्ठान पिशाच मोचन कुंड के सात घाटों पर किया जाता है. शेर वाला घाट के तीर्थ पुरोहित कृष्णा पाण्डेय के मुताबिक, इन सात घाटों में शामिल हैं.

  • बांकड़े घाट
  • शेर वाला घाट
  • पिशाच मोचन घाट
  • दीक्षित घाट
  • नया घाट
  • मिश्रा घाट
  • उपाध्याय घाट

त्रिपिंडी श्राद्ध करने के बाद, श्रद्धालु पास स्थित कपर्दिश्वर महादेव का जलाभिषेक करते हैं. कहा जाता है कि इस अनुष्ठान को पूरा करने के बाद ही गया जी जाकर पितरों को बिठाया जाता है.

पितृपक्ष में उमड़ती है लाखों की भीड़

पितृपक्ष के 14 दिनों की अवधि में देश और दुनिया भर से लगभग पांच लाख से अधिक परिवार त्रिपिंडी श्राद्ध कराने के लिए काशी आते हैं. इस अनुष्ठान को कराने वाले करीब डेढ़ सौ परिवार तीर्थ पुरोहित के रूप में इस कार्य से जुड़े हैं. इस अनुष्ठान में औसतन आठ से दस हज़ार रुपए का खर्च आता है. यह अनुष्ठान न केवल पितरों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह उन परिवारों के लिए भी आशा की किरण है जो पितृ दोष से मुक्ति पाना चाहते हैं. काशी में होने वाला यह त्रिपिंडी श्राद्ध, सदियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा है जो आस्था, श्रद्धा और मोक्ष की भावना को दर्शाती है.

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