सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि बताते हुए, एक नाबालिग लड़के की अंतरिम कस्टडी उसके पिता को सौंपने के पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. इस दौरान कोर्ट ने ब्रिटेन और भारत दोनों देशों की अदालतों को बच्चे के ठिकाने के बारे में गुमराह करने के लिए मां के आचरण की कड़ी निंदा की.सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस व्यक्ति की पत्नी ने भारत और ब्रिटेन की न्यायिक प्रणाली के साथ जोड़-तोड़ किया जिसका कारण वह ही बता सकती है. जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने महिला के आचरण की निंदा करते हुए कहा कि यह मामला महिला और उसके पति के बीच गहरे तनाव को दर्शाता है, जो भारत में एक साथ रहने और अपने बच्चों के पालन-पोषण के संबंध में दोनों के अलग-अलग इरादों के कारण उत्पन्न हुआ है.
बच्चों से मिलने को लेकर विवाद बढ़ा विवाद
बेंच ने कहा कि इस विवाद से न केवल उनके वैवाहिक संबंध खराब हुए हैं, बल्कि उनके दो बच्चों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिनमें से एक बच्चा अपनी मां के साथ ब्रिटेन में रह रहा है. कोर्ट ने कहा कि नवंबर 2010 में शादी करने वाले दंपत्ति के बीच संबंधों में लंबे समय से अनबन जारी थी और दो बच्चों से मिलने को लेकर विवाद और बढ़ गया.
कोर्ट ने की मां के बर्ताव की निंदा
कोर्ट ने कहा कि यह महज अहंकार का टकराव नहीं है, बल्कि प्रथम दृष्टया यह चिंताजनक मानसिकता को दर्शाता है, जिससे अंततः नाबालिग बच्चों के कल्याण पर प्रभाव पड़ा. बेंच ने महिला के आचरण का जिक्र करते हुए कहा कि उसने अपने बेटे को भारत में छोड़ते समय पिता को सूचित करने का कर्तव्य नहीं निभाया. बेंच ने कहा कि यह महिला का कर्तव्य था कि वह ब्रिटेन के उच्च न्यायालय में आवेदन करते समय उसे यह बताए कि लड़का वहां उसके साथ नहीं रहता.
बेंच ने कहा कि यह ध्यान देने की बात है कि इस तरह के आचरण के कारण पिता को ब्रिटेन उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद मास्टर के (लड़के) के साथ ऑनलाइन माध्यम से मुलाकात करने से वंचित रखा गया और अंततः संदेह उत्पन्न होने पर उन्हें (पिता) को (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष) बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करनी पड़ी.
‘कोर्ट के आदेश का मां ने नहीं किया सम्मान’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि महिला कभी अपने बेटे को उसके पिता से मिलने नहीं देना चाहती थी और अदालत के आदेश को लेकर उसके मन में जरा भी सम्मान नहीं था. बेंच ने कहा कि मां ने भारत और ब्रिटेन की न्यायिक प्रणाली के साथ जोड़-तोड़ की जिसका कारण वह खुद ही बेहतर जानती हैं.
क्या है मामला
यह मामला एक पति (पिता) और पत्नी (मां) के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक कलह से उपजा है, जिनकी शादी 2010 में हुई थी. विवाद तब बढ़ गया जब 8 मई, 2021 को मां अपनी नाबालिग बेटी मिस एन के साथ पिता की जानकारी या सहमति के बिना यूनाइटेड किंगडम चली गईं. उन्होंने अपने नाबालिग बेटे मास्टर के को भारत के सोनीपत में अपने माता-पिता की देखरेख में छोड़ दिया था.
महिला के पति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसकी पत्नी मई 2021 में उसे बताए बिना या उसकी सहमति लिए बिना दोनों बच्चों के साथ भारत छोड़कर ब्रिटेन चली गई. बाद में पति को पता चला कि उनका नाबालिग बेटा सास-ससुर के साथ भारत में है. इसके बाद उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने बच्चों की कथित अवैध अभिरक्षा का मुद्दा उठाया.
बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर को दिए गए अपने फैसले में कहा कि महिला को लंदन की एक अदालत की ओर से तलाक लेने की अनुमति मिली, जबकि पुरुष को जींद की अदालत से तलाक की अनुमति मिली. कोर्ट ने कहा कि संक्षेप में, दोनों पक्ष तलाक चाहते हैं, इसके बाद वो अलग-अलग न्यायालयों द्वारा दिए गए आदेशों को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं और उन्हें चुनौती देना जारी रखते हैं, जिसके लिए वे कानूनी रूप से हकदार हैं. मध्यस्थता के प्रयास विफल हो गए हैं. बेंच ने कहा कि लड़के की अंतरिम अभिरक्षा उसके पिता को सौंपने का हाई कोर्ट का फैसला सही है. कोर्ट ने बच्चे के नाना को निर्देश दिया कि वो पंद्रह दिनों के भीतर नाबालिग मास्टर के की कस्टडी पिता को सौंप दें.
















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