इंदौर। मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने दुर्घटना क्लेम के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए मृतक के आश्रितों को क्षतिपूर्ति देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि मृतक के आयकर रिटर्न पर उसके हस्ताक्षर और आयकर अधिकारी की मुहर नहीं थी।
आयकर रिटर्न एक वैधानिक दस्तावेज है। अगर इसकी प्रमाणिकता को लेकर जिला न्यायालय को किसी तरह का संशय था तो कोर्ट को आयकर विभाग से उसकी प्रमाणिकता की जांच करवाना थी। रिटर्न जमा करने वाले के हस्ताक्षर और अधिकारी की मुहर नहीं होने का मतलब यह बिलकुल नहीं कि रिटर्न जमा ही नहीं किया गया है।
मृतक के तीन वर्ष के आयकर रिटर्न देखने से यह बात स्पष्ट है कि उसकी आय में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी। हाई कोर्ट ने मृतक के आश्रितों को जिला कोर्ट द्वारा दिलवाई गई तीन लाख 82 हजार रुपये की क्षतिपूर्ति को अपर्याप्त मानते हुए इसे बढ़ाकर 21 लाख 65 हजार रुपये करने का आदेश दिया।
मामला इंदौर जिला निवासी हंसराज का है। वे 8 जुलाई 2010 को अपने मित्र के साथ कार में जा रहे थे कि आगे चल रहे टैंकर के चालक द्वारा अचानक ब्रेक लगाने से उनकी कार टैंकर में घुस गई। हादसे में हंसराज की मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी अनिता, दो नाबालिग बच्चों और मां ने जिला कोर्ट में क्षतिपूर्ति के लिए दावा प्रस्तुत किया।
इसमें उन्होंने हंसराज द्वारा जमा कराए गए तीन वर्ष के आयकर रिटर्न और रिटर्न जमा करने की रसीद प्रस्तुत की। बीमा कंपनी ने रिटर्न जमा करने की रसीद को लेकर आपत्ति ली। बीमा कंपनी के अधिवक्ता का कहना था कि रिटर्न जमा करने वाले के हस्ताक्षर और आयकर अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं है।
इस पर कोर्ट ने रिटर्न को साक्ष्य में अग्राह्य मानते हुए हंसराज के आश्रितों को सिर्फ तीन लाख 82 हजार रुपये क्षतिपूर्ति दिलवाई। इस फैसले को हंसराज के आश्रितों ने एडवोकेट राजेश खंडेलवाल और समीर वर्मा के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी।
एडवोकेट खंडेलवाल ने हाई कोर्ट में तर्क रखे कि हंसराज के आश्रितों ने आयकर रिटर्न जमा करने की रसीद प्रस्तुत की है। इस पर रिटर्न जमा वाले के हस्ताक्षर होना अनिवार्य नहीं है।
आयकर रिटर्न से स्पष्ट है कि हंसराज की विभिन्न माध्यमों से आय थी और इस आय के हिसाब से ही उसके आश्रितों को क्षतिपूर्ति दिलवाई जाना चाहिए, लेकिन जिला कोर्ट ने ऐसा नहीं किया।
न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी ने अपील स्वीकारते हुए बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह मृतक हंसराज के आश्रितों को 21 लाख 82 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान करे।
यह भी कहा हाई कोर्ट ने
- हाई कोर्ट ने कहा कि रिटर्न की गहन जांच से स्पष्ट है कि हंसराज को अन्य आय के अलावा मुख्य रूप से किराना व्यवसाय और श्रम ठेकेदारी से आय होती थी।
- आय की गणना और आयकर रिटर्न की रसीद रिकार्ड में दर्ज हैं। जिला कोर्ट के लिए इसे इस आधार पर खारिज करने का कोई कारण नहीं था कि रसीद पर आयकर अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं, क्योंकि विभाग द्वारा उचित स्टांप और रसीद संख्या प्रदान की गई है।
- अगर किसी तरह की भ्रम की स्थिति थी, तो कोर्ट दस्तावेजों की प्रामाणिकता की पुष्टि विभाग को भेजकर कर सकता था या बीमा कंपनी इसके लिए कदम उठा सकती थी।
















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