जबलपुर। इंदौर में दूषित पानी पीने से 17 लोगों की मौत के बाद जबलपुर नगर निगम ने भी पानी की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है। नगर निगम प्रशासन का दावा है कि शहर में जलापूर्ति करने वाले रमनगरा, ललपुर, भोंगाद्वार और रांझी वाटर फिल्टर प्लांट में पानी को कैमिकल व मशीनरी प्रक्रिया से गुजार कर साफ किया जाता है और फिर वाटर फिल्टर प्लांट की लैब में 23 बिंदुओं पर गहन परीक्षण करने के बाद राइजिंग मेन लाइन के जरिये नागरिकों के लिए सप्लाई किया जाता है। हालांकि नगर निगम के इस दावे के विपरित हकीकत कुछ अलग ही है।
क्योंकि लैब में परीक्षण कर की किया जाने वाला पेयजल तो शुद्ध व मानक स्तर का होता है परंतु लोगों के घरों तक यह पानी टंकियों और फिर पाइपलाइन के जरिये पहुंचता है इससे पानी की गुणवत्ता बदल जाती है। इसके पीछे कारण यही बताया जा रहा है कि अधिकांश पुरानी हो चुकी टंकिया, भूमिगत टैंकों की ढंग से सफाई नही होती और टंकियों से जो पानी लोगों के घरों तक पहुंचता है वह नाला-नालियों के नीचे से होकर पाइपलाइन के संपर्क में आ जाता है और लैब के परीक्षण में पास ये पानी घरों के नलों तक पहुंचते-पहुंचते गुणवत्ता में फेल होने के करीब पहुंच जाता है।
जोन कार्यालयों से भी भेजे जा रहे पानी के साफ सैंपल, 312 में सभी पास
इंदौर की घटना के बाद सकते में आया नगर निगम जलापूर्ति लाइनों की जांच करवा रहा है। जोन स्तर पर जल विभाग और स्वास्थ्य विभाग की टीम लीकेज पाइपलाइन मिलने पर उसकी मरम्मत करवा रही है। इसके बाद पानी के सैंपल लेकर लैब में परीक्षण के लिए भेजा जा रहा है। नगर निगम की इन चारों लैबों में रोजाना पर 70 से 80 पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे जा रहे हैं।
इनमें से रोजाना प्रति लैब 18 से 20 सैंपल का परीक्षण किया जा रहा है। सिर्फ ललपुर प्लांट में ही एक जनवरी से आठ जनवरी तक 312 पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे गए। जो परीक्षण में साफ व पीने योग्य पाए गए इनमें किसी तरह को कोई बैक्टीरिया नही मिला टीडीएस का स्तर भी सामान्य पाया गया।
अमृत मित्र का सर्वे भी बंद
इधर नगरीय निकाय की पेयजल आपूर्ति की गुणवत्ता जांचने अमृत मित्र के तहत यह शहरी आजीविका मिशन से जुड़ी स्वयंसेवी महिला संगठनों को पानी की जांच का जिम्मा भी सौंपा था। तीन-तीन माह के लिए कराई जांच कराई जा रही थी। पानी के सैंपल की जांच कराने वाली एजेंसी ने पांच स्वसहायता समूह की 10-10 महिलाओं से शहर के 79 वार्ड में जाकर पानी के सैंपल लिए। प्रत्येक वार्ड में 27 फील्ड टेस्ट और तीन लैब टेस्ट किए। करीब 2000 सैंपल की जांच की गई।
निगम की लैब में बीआईएस के मानकों से होती है जांच
- ललपुर वाटर फिल्टर प्लांट की लैब में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के निर्धारित मानकों के आधार पर पानी की गुणवत्ता चेक की जाती है। 23 बिंदुओं पर पानी की गुणवत्ता परखी जाती है।
- निगम की लैब में पाया कि पानी में टोटल डिजाल्व सालिड (टीडीएस) यानि पानी में घुले हुए कुल ठोस पदार्थों की मात्रा है, जिसमें खनिज (कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम), लवण (क्लोराइड, सल्फेट) और कुछ कार्बनिक पदार्थ शामिल होते हैं, जो पानी के स्वाद और गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। यह पानी की शुद्धता का एक संकेतक है। इसका स्तर 500 तक स्वीकार्य है और कोई अन्य वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध न हो तो 2000 तक भी स्वीकार्य मानकर परीक्षण किया जाता है।
- जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तय मानकों में 300 से कम टीडीएस की मात्रा वाले पानी को स्वाद और गुणवत्ता में “उत्कृष्ट” माना जाता है। 500 स्तर होने पर पाचन संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है। पर्यावरण विद व वाटर क्वालिटी एक्सपर्ट डा विनोद दुबे भी डब्ल्यूएचओ के अनुसार पानी में 300 से कम टीडीएस को सही मानते हैं।
- शहर के कई क्षेत्रों में पानी की टंकियों की सफाई और नाला-नालियों से गुजरने वाली जलवितरण लाइनों के कारण पानी में टीडीएस की मात्रा 600 और उसके पार भी मिली। लोग यही पानी पी रहे हैं।
टंकियों के ऐसे हैं हालात
66 साल पुराना भूमिगत टैंक हो चुका जर्जर, पानी में टूट कर समा रहा मलबा कांचघर स्थित कुलीहिल टैंक है। लगभग 66 वर्ष पुराने इस टैंक की स्लेब (छत) पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। छह वर्ष पूर्व इसका बड़ा हिस्सा दो जगह से दो बार टूटकर पानी से भरे टैंक में समा चुका है।
नगर निगम सफाई की औपचारिकताओं के बीच नागरिकों को मलबायुक्त गंदा पेयजल पिला रहा है। करीब 14 फीट क्षमता वाले इस टैंक को 10 से 12 फीट तक ही भरा जा रहा है। नागरिकों का कहना है कि कभी-कभी मटमैला पानी भी आ रहा है।
यही हाल हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी स्थित भूमिगत टैंक का भी है। 50 साल पुराने इस भूमिगत टैंक की सफाई भी वर्षों से नही हुई। आस-पास गंदगी बजबजा रही है। यही पानी कालोनी में सप्लाई हो रहा है।
















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