भारतीय परिवारों में सोने-चांदी की जगह बहुत खास होती है. यह केवल गले, हाथ या पैर की शोभा बढ़ाने वाली एक धातु नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से इसे सुरक्षा और समृद्धि का सबसे मजबूत प्रतीक माना जाता रहा है. हर घर में यह धारणा रही है कि बुरा वक्त आने पर सोना-चांदी ही साथ निभाएगा. लेकिन साल 2025 में इन कीमती धातुओं की कीमतों में आई ऐतिहासिक तेजी ने आम आदमी की इस धारणा पर महंगाई की गहरी चोट की है. बीते साल सोने के भाव में करीब 74 फीसदी का जबरदस्त उछाल आया, जिसके चलते 10 ग्राम सोने की कीमत 1.30 लाख रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर गई. इस कमरतोड़ महंगाई का सीधा असर बाजार की चमक पर पड़ा है. कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन सर्राफा बाजारों में भीड़ कम हो गई है. आंकड़ों की मानें तो सोने की खपत, जो 2024 में 802.8 टन थी, उसके गिरकर 650 से 700 टन के बीच रह जाने की आशंका है.
चांदी की चमक से सोना हुआ फेल
अगर आपको लगता है कि सिर्फ सोने ने ही रिकॉर्ड तोड़े हैं, तो आपको चांदी की चाल देखनी चाहिए. साल 2025 सही मायनों में चांदी के नाम रहा. इस धातु ने निवेशकों को हैरान करते हुए 129 फीसदी से ज्यादा का मुनाफा दिया है. दिल्ली के बाजारों में चांदी 2,07,600 रुपये प्रति किलोग्राम के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गई. इसका मुख्य कारण आभूषणों से ज्यादा उद्योगों और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में इसकी बढ़ती मांग है. चांदी अब केवल ‘गरीबों का सोना’ नहीं रही, बल्कि एक ‘मल्टीबैगर’ एसेट क्लास बन चुकी है, जिसने रिटर्न के मामले में सोने को भी पीछे छोड़ दिया है.
अब भारी नहीं, ‘लाइटवेट’ ज्वेलरी का दौर
महंगाई ने भारतीय खरीदारों की पसंद को पूरी तरह बदल दिया है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, बाजार में एक स्पष्ट विभाजन दिख रहा है. एक तरफ अमीर निवेशक हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से सोने के सिक्के और ईंटें खरीद रहे हैं. वहीं, दूसरी तरफ मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग भारी-भरकम गहनों से तौबा कर रहे हैं. अब लोग कम वजन वाले यानी ‘लाइटवेट’ 22 कैरेट के गहनों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इस बदलाव का सबसे बुरा असर छोटे और अकेले शोरूम चलाने वाले जौहरियों पर पड़ा है, क्योंकि उनकी रोजमर्रा की बिक्री काफी घट गई है.
इन 3 कारणों से बढ़े दाम
सोने-चांदी की कीमतों में यह आग केवल त्योहारी मांग के कारण नहीं लगी है, इसके पीछे वैश्विक समीकरण हैं.
- केंद्रीय बैंकों की होड़: दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए अंधाधुंध सोना खरीद रहे हैं.
- युद्ध और तनाव: दुनिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और ट्रेड वॉर के माहौल में निवेशक सोने को ही सबसे सुरक्षित ठिकाना मान रहे हैं.
- रुपये की कमजोरी: डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना भारतीय निवेशकों के लिए सोने को और महंगा बना देता है.
2026 के लिए क्या है ‘मास्टर प्लान’?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 2026 में भी ऐसा ही मुनाफा मिलेगा? बाजार विशेषज्ञों ने इसे लेकर निवेशकों को सतर्क किया है. उनका कहना है कि पिछले प्रदर्शन को देखकर भविष्य का फैसला न करें. 2026 में निवेश के लिए एक अनुशासित रणनीति की जरूरत है. अगर आपके पोर्टफोलियो में सोने का हिस्सा बहुत बढ़ गया है, तो थोड़ा मुनाफा वसूलना समझदारी होगी. इस पैसे को इक्विटी या अन्य एसेट्स में लगाकर संतुलन बनाएं. इसके अलावा, एकमुश्त पैसा लगाने के बजाय ‘सिप’ (SIP) का रास्ता अपनाएं. गोल्ड ईटीएफ या म्यूचुअल फंड में हर महीने थोड़ा-थोड़ा निवेश करने से कीमतों के उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है. 2026 में पैसा वही बनाएगा जो भावुकता के बजाय सूझबूझ और रिसर्च के साथ निवेश करेगा.
















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