देशभर में श्रद्धा और सम्मान की प्रतीक देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा को लेकर विवाद अब और गहराता जा रहा है. मामला उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित अहिल्या घाट से जुड़ा है, जहां जिला प्रशासन द्वारा देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा और उससे जुड़े मंदिर को हटाए जाने की कार्रवाई की गई. जैसे ही यह खबर सामने आई, काशी से लेकर मध्य प्रदेश तक विरोध की लहर दौड़ गई.
स्थानीय लोगों और संगठनों का कहना है कि यह प्रतिमा कोई साधारण मूर्ति नहीं, बल्कि अहिल्याबाई होलकर के उस ऐतिहासिक योगदान की प्रतीक है, जिसके तहत उन्होंने काशी के घाटों और मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया था. ऐसे में प्रतिमा हटाना सीधे तौर पर आस्था और इतिहास दोनों पर चोट माना जा रहा है.
काशी से इंदौर तक क्यों भड़का गुस्सा?
प्रतिमा हटाने की घटना सामने आने के बाद मध्य प्रदेश, खासकर इंदौर में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई. इंदौर स्थित ऐतिहासिक राजवाड़ा पर इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. लोगों का कहना है कि जिन अहिल्याबाई होलकर ने काशी को संवारा, उन्हीं की प्रतिमा को हटाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.
राजवाड़ा पर धरना, सज्जन सिंह वर्मा का बड़ा हमला
इस पूरे मामले ने तब और तूल पकड़ लिया, जब मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा खुद इंदौर के राजवाड़ा पहुंचे और देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा के चरणों में बैठकर धरना दिया. उनके साथ बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता भी मौजूद रहे.
धरने के दौरान सज्जन सिंह वर्मा ने भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा एक तरफ अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती बड़े धूमधाम से मना रही है, वहीं दूसरी तरफ उनकी धरोहरों और स्मृतियों का अपमान किया जा रहा है. वर्मा ने इसे भाजपा का “दोहरा चरित्र” बताते हुए कहा कि धर्म और आस्था के नाम पर राजनीति की जा रही है.
प्रशासन और भाजपा पर सवाल
वर्मा ने कहा कि अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराए गए घाटों के जीर्णोद्धार के सम्मान में स्थानीय लोगों ने प्रतिमा स्थापित की थी. उसे हटाना करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसा है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर सरकार सच में धर्म और परंपरा का सम्मान करती है, तो ऐसी कार्रवाई कभी नहीं होती. इधर प्रशासन का तर्क है कि यह कदम व्यवस्थागत और तकनीकी कारणों से उठाया गया, लेकिन विरोध कर रहे लोग इस दलील को मानने को तैयार नहीं हैं.
क्यों इतना संवेदनशील है अहिल्याबाई का मुद्दा?
देवी अहिल्याबाई होलकर को केवल एक शासिका नहीं, बल्कि सुशासन, न्याय और धर्मपरायणता की मिसाल माना जाता है. काशी, उज्जैन, सोमनाथ और देश के कई हिस्सों में उनके योगदान को आज भी श्रद्धा से याद किया जाता है. यही वजह है कि उनकी प्रतिमा से जुड़ा कोई भी कदम भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा मुद्दा बन जाता है.
अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि प्रतिमा और मंदिर को दोबारा कब और कैसे स्थापित किया जाएगा. प्रशासन अपने फैसले पर क्या सफाई देता है. भाजपा और कांग्रेस के बीच यह मुद्दा कितना बड़ा राजनीतिक रूप लेता है. फिलहाल इतना तय है कि अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा को लेकर उठा यह विवाद आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है.
















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