पिछले कुछ समय से जारी चांदी की ऐतिहासिक तेजी अब थम सकती है. बाजार के दिग्गज जानकारों ने चेतावनी दी है कि चांदी के दामों में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी ने 82.670 डॉलर प्रति औंस का रिकॉर्ड स्तर छुआ था, लेकिन सप्ताह की शुरुआत में ही यह लुढ़ककर 71.300 डॉलर पर आ गई. इस गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि निवेशक अपना मुनाफा बुक करें और बाजार से बाहर निकल जाएं, क्योंकि आने वाले समय में कीमतों में 60 प्रतिशत तक की गिरावट की आशंका जताई जा रही है.
क्यों आसमान छू रहे थे चांदी के दाम?
पिछले एक साल यानी 2025 में चांदी ने निवेशकों को मालामाल किया है. मांग और आपूर्ति में भारी अंतर के कारण इसकी कीमतों में लगभग 180 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी. इस तेजी के पीछे कई बड़े कारण थे. सैमसंग जैसी दिग्गज कंपनी ने लिथियम-आयन बैटरी की जगह सॉलिड-स्टेट बैटरी की तरफ जाने का ऐलान किया, जिससे चांदी की औद्योगिक मांग अचानक बढ़ गई. इसके अलावा, पेरू और चाड जैसे देशों से सप्लाई में बाधा, अमेरिका-वेनेजुएला के बीच तनाव और चीन द्वारा 1 जनवरी 2026 से चांदी के निर्यात पर लगाई गई परोक्ष रोक ने आग में घी का काम किया. इन सब वजहों से चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं, लेकिन अब यही तेजी उद्योगों के लिए मुसीबत बनती जा रही है.
महंगी चांदी से उद्योगों ने मोड़ा मुंह
Pace 360 के चीफ ग्लोबल स्ट्रैटेजिस्ट अमित गोयल के अनुसार, कोई भी इंडस्ट्री किसी कच्चे माल का उपयोग तभी तक करती है जब तक वह आर्थिक रूप से उनके लिए फायदेमंद हो. जब लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, तो कंपनियां विकल्प तलाशने लगती हैं. चांदी के साथ अब ठीक वैसा ही हो रहा है. सोलर पैनल और फोटोवोल्टिक सेल बनाने वाली कंपनियों ने चांदी की जगह तांबे (कॉपर) का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. बैटरी सेक्टर में भी चांदी को तांबे से रिप्लेस करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. इज़राइल, ताइवान, ऑस्ट्रेलिया और चीन की कंपनियां इस दिशा में तेजी से काम कर रही हैं. यह बदलता रुझान चांदी की भविष्य की मांग पर गहरा असर डाल सकता है.
बाजार का इतिहास गवाह है कि जब भी चांदी में ऐसी बेतहाशा तेजी आई है, उसके बाद एक बड़ी गिरावट देखने को मिली है. Ya Wealth के डायरेक्टर अनुज गुप्ता ने पुराने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 1980 में हंट ब्रदर्स के समय चांदी लगभग 49.5 डॉलर से गिरकर सीधे 11 डॉलर पर आ गई थी. इसी तरह 2011 में भी चांदी 48 डॉलर से गिरकर करीब 75 प्रतिशत तक टूट गई थी. अब एक्सचेंजों द्वारा मार्जिन बढ़ाए जाने से बाजार में फिर वैसी ही स्थिति बनती दिख रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि खुदरा निवेशकों को इस समय नई खरीद से बिल्कुल बचना चाहिए और बाजार की चाल को समझना चाहिए.
आने वाले समय में कहां तक जा सकते हैं भाव?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि चांदी या तो अपने उच्चतम स्तर को छू चुकी है या फिर शॉर्ट-कवरिंग के चलते फरवरी 2026 तक यह 100 डॉलर प्रति औंस के आसपास जा सकती है. लेकिन यह तेजी अल्पकालिक होगी. वित्त वर्ष 2027 (FY27) तक चांदी पर भारी दबाव देखने को मिल सकता है. अगर 82.670 डॉलर का स्तर ही टॉप साबित होता है, तो वित्त वर्ष 2027 के अंत तक कीमतें गिरकर 35 से 40 डॉलर प्रति औंस तक आ सकती हैं. यानी मौजूदा स्तर से निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
















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