इंदौर : इंदौर में होलकर वंश द्वारा स्थापित कई मंदिर हैं. लेकिन शहर की धड़कन राजवाड़ा पर स्थित महालक्ष्मी मंदिर विशेष महत्त्व रखता है. यहां माता लक्ष्मी का रूप इतना तेजस्वी है कि ऐसा लगता है जैसे मां स्वयं यहां विराजमान है. मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां 56 भोग का प्रसाद चढ़ाते है. कहा जाता है कि राजवाड़ा के अधिकांश व्यापारी अपने दिन की शुरुआत महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन से ही करते है.
मंदिर में सेवा कर रहे पांचवी पीढ़ी के भानु प्रकाश दुबे ने बताया कि राजवाड़ा चौराहे पर स्थित यह मंदिर करीब 200 साल पुराना है. जिसका निर्माण महाराजा हरिराव होलकर ने 1832 में कराया था. होलकर शासक देवी लक्ष्मी को अपनी कुलदेवी मानते थे और महल के ठीक पीछे होने के कारण इसे राज्य की समृद्धि का प्रतीक माना जाता था. मंदिर इतना भव्य था कि इसे दूर-दूर से लोग देखने आते थे. मां की मूर्ति के साथ इसकी खासियत थी तीन मंजिला लकड़ी की इमारत जिसमें बहुत ही खूबसूरती से नक्काशी की गई थी.
धन की देवी महालक्ष्मी के भक्त यहां अधिकतर मकान बनाने और नौकरी की पेशकश के लिए आते है. साथ ही शादी, वाहन और संतान प्राप्ति की कामना भी करते है. पुजारी ने बताया कि यहां की एक अनोखी परंपरा है कि लोग माता के चरणों में चावल चढ़ाते है और कुछ दाने मन्नत के रूप में घर ले जाते है. मान्यता है कि इन चावलों को अपनी तिजोरी में रखने से धन की कमी नहीं होती. हर साल 50 से अधिक 56 भोग मां को चढ़ाए जाते है जो भक्त अपनी मुराद पूरी होने पर समर्पित करते है. पुजारी ने कई ऐसे लोगों को देखा है जो दुखी होकर आए थे और सप्ताह के भीतर ही उनका काम हो जाने पर धन्यवाद अर्पित करने लौटे.
महालक्ष्मी मंदिर के इतिहास में 1933 का अग्निकांड सबसे बड़ी घटना मानी जाती है. जब आग इतनी भयंकर थी कि पूरी लकड़ी की संरचना जलकर खाक हो गई. पर माता की प्रतिमा को खरोंच तक नहीं आई. इससे पहले एक बार पुरानी लकड़ी के कारण मंदिर ध्वस्त हो गया था. तब भी मां की मूर्ति सुरक्षित रही. कई सालों तक मूर्ति छोटे से गर्भगृह में रही. लेकिन समय के साथ अब भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है.
मंदिर में महालक्ष्मी की अष्टधातु की मूर्ति स्थापित है. जिसमें बड़ी सी नथ और विशाल स्वर्ण मुकुट उनकी शोभा बढ़ाते है. श्रृंगार के बाद रूप इतना तेजस्वी होता है कि माता लक्ष्मी स्वयं सिंहासन पर बैठी प्रतीत होती है. दिवाली और विशेष पर्वों पर माता को हीरे, पन्ने, माणक और सोने के प्राचीन आभूषण पहनाए जाते है. दिवाली की रात यहां पैर रखने की जगह नहीं होती और मंदिर को फूलों और लाइटों से दुल्हन की तरह सजाया जाता है. लक्ष्मी पूजन के दिन मंदिर के कपाट 24 घंटे खुले रहते है. नवरात्रि के 9 दिनों में भी माता का हर दिन 4 बार श्रंगार किया जाता है.
















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