आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अवसाद और बुरी आदतें इंसान को भीतर से खोखला कर रही हैं. कई बार ऐसी स्थिति आती है जब व्यक्ति को अपनी ही जिंदगी बोझ लगने लगती है. प्रेमानंद महाराज ने ऐसे ही एक भक्त के सवाल का जवाब देते हुए जीवन जीने की नई राह दिखाई है. उन्होंने बताया कि मन की अशांति और बुरी आदतों से छुटकारा पाना असंभव नहीं है, बस इसके लिए सही दिशा और संकल्प की जरूरत है. आइए जानते हैं इसके उन्होंने कौन से समाधान बताएं.
नाम जप में है अपार शक्ति
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर नहीं, बल्कि अपने मन से होती है. यदि मन पर नियंत्रण पा लिया जाए, तो जीवन अपने आप हल्का और आनंदमय बन सकता है. जब आप मन से पूरी तरह हार चुके हों और कोई रास्ता न सूझे, तो नाम जप का सहारा लें. आप राधा-राधा या अपने इष्ट देव के नाम का निरंतर मानसिक जाप शुरू करें. महाराज जी कहते हैं कि नाम जप में वह सामर्थ्य है जो बड़ी से बड़ी बुरी आदतों को जड़ से मिटा सकता है. यह आपके भीतर आत्मबल पैदा करता है.
इंद्रियों पर नियंत्रण
मन को काबू करने के लिए प्रेमानंद महाराज ने दो कड़े परहेज बताए हैं.
गलत दृश्यों का त्याग: मोबाइल या इंटरनेट पर अश्लील और नकारात्मक दृश्य देखना तुरंत बंद करें. ये मन को गंदा करते हैं.
सात्विक भोजन: तामसिक भोजन को छोड़कर सात्विक आहार अपनाएं. जैसा अन्न होगा, वैसा ही मन बनेगा. पुराने अभ्यासों को छोड़ने के लिए आपको कड़े कदम उठाने ही होंगे.
शारीरिक व्यायाम है अनिवार्य
मानसिक शांति के लिए शरीर का स्वस्थ होना जरूरी है.
प्रतिदिन सुबह 2-3 किलोमीटर की दौड़ लगाएं.
15-20 मिनट दंड-बैठक या व्यायाम करें. व्यायाम करने से मस्तिष्क में ताजगी आती है और गंदे या नकारात्मक विचारों से ध्यान हटाने में मदद मिलती है.
हार न मानें
यदि आप किसी बुरी आदत को छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं और बार-बार असफल हो रहे हैं, तो निराश न हों. प्रेमानंद महाराज कहते हैं, अगर आप 100 बार हार गए हैं, तो 101वीं बार फिर से जीतने का प्रयास करें. खुद को भगवान का अंश समझें, लाचार नहीं. डिप्रेशन से बचने का यही एकमात्र तरीका है कि आप हिम्मत न हारें.
शरणागति और पुकार
जब काम, क्रोध या कोई भी नकारात्मक विचार आप पर हावी होने लगे, तो उस समय घबराने के बजाय भगवान को पुकारें. जैसे हम संकट में अपनों को बुलाते हैं, वैसे ही कहें हे प्रभु, मेरी रक्षा कीजिये.प्रेमानंद महाराज का संदेश साफ है कि रुपया-पैसा और सांसारिक सुख केवल शरीर रहने तक ही काम आएंगे. असली शांति केवल भजन और अध्यात्म से मिलती है. वे कहते हैं कि अपने हर कर्म को भगवान को समर्पित कर दें, बस यह ध्यान रखें कि वह पाप कर्म न हो.
















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