भोपाल। सरकारी दफ्तरों में कामकाज के साथ मातृत्व की जिम्मेदारी निभाने वाली महिलाओं के लिए बना ‘झूलाघर’ अब खुद अपनी बदहाली पर रो रहा है। प्रदेश के प्रशासनिक केंद्र, वल्लभ भवन (मंत्रालय) में संचालित यह झूलाघर किसी आधुनिक केंद्र के बजाय एक बंद कमरे में नजर आता है। प्रशासन के बड़े-बड़े दावों के बीच सच्चाई यह है कि बच्चों का खिलखिलाता बचपन अब एक संकरे और बंद कमरे में सिमटकर रह गया है।
खुले आसमान से चार दीवारी तक का सफर
कभी खुले परिसर में संचालित होने वाला यह झूलाघर बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास का केंद्र था। लेकिन व्यवस्था सुधारने के नाम पर इसे एक छोटे से कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। यहां न बच्चों के दौड़ने-खेलने की जगह है और न ही तरोताजा करने वाली हवा का कोई इंतजाम।
45 लाख का प्रस्ताव… फाइलों में दफन
एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने नए और सर्वसुविधायुक्त झूलाघर के निर्माण के लिए 45 लाख रुपये का बजट प्रस्तावित किया था। यह प्रस्ताव पिछले कई सालों से मंत्रालय की फाइलों में धूल खा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों की सुस्ती पर सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों की सुरक्षा और उनके विकास से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर वित्त विभाग की मंजूरी का इंतजार 6 साल लंबा होना चाहिए?
अधिकारी बोलने को तैयार नहीं
वहीं एक बाल रोग विशेषज्ञ का कहना है कि बच्चों को लंबे समय तक बंद और सीमित वातावरण में रखना उनके व्यवहार में परिवर्तन ला सकता है। वहीं महिला एवं बाल विकास के जिला कार्यक्रम अधिकारी सुनील सोलंकी ने बात करने से मना कर दिया।
















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