जबलपुर। सेना से सेवानिवृत्त एक जेल प्रहरी को उसके ही दो साथी जेल प्रहरियों ने अपने दो अन्य साथियों के साथ मिलकर 20 लाख रुपये का चूना लगा दिया। चारों ने उसे उसकी पत्नी के नाम पर गैस एजेंसी दिलाने का झांसा दिया था। आरोपितों ने उसे फर्जी लाइसेंस भी थमा दिए, लेकिन जब इस बात का खुलासा हुआ, तो पीड़ित ने दी हुई रकम वापस मांगी। रकम नहीं मिली। मामले में न्यायालय में परिवाद दायर किया गया, जहां से चारों के खिलाफ एफआईआर के आदेश जारी किए गए।
आदेश के बाद सिविल लाइंस पुलिस ने आरोपितों पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज बनाने, आपराधिक षड़यंत्र और आईटी एक्ट की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस केन्द्रीय कारागार के क्वार्टर में रहने वाले धीरेन्द्र द्विवेदी सेना से रिटायर होने के बाद जेल प्रहरी बने। वर्ष 2022 में वे जबलपुर सेन्ट्रल जेल में पदस्थ थे। वर्तमान में उनकी पदस्थापना सागर जेल में है।
जबलपुर में पदस्थपना के दौरान उनकी पहचान एक अन्य जेल प्रहरी जितेन्द्र धाकड़ से हुई। जितेन्द्र ने धीरेन्द्र को गैस एजेंसी का लाइसेंस दिलाने का झांसा दिया। यह भी बताया कि उसने सतना में पदस्थ जेल प्रहरी अनिल शर्मा को भी पेट्रोल पंप का लाइसेंस दिलाया है। यह भी बताया कि अनिल भी सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद जेल प्रहरी बने हैं। उसने अपनी पहचान राजनीतिक रूप से मजबूत होने का दावा किया।
पत्नी के साथ एजेंसी दिलाने का भरोसा
धीरेन्द्र ने पत्नी निशा के नाम पर गैस एजेंसी दिलाने की बात कही। पहले जितेन्द्र ने एक लाख 95 हजार रुपये लिए। तब जितेन्द्र ने अनिल से बात कराई। अनिल ने कहा कि उसका पेट्रोल पंप का लाइसेंस योगेश मिश्रा ने बनवाकर दिया था। योगेश से धीरेन्द्र की कान्फ्रेस में बात कराई। योगेश ने बोला कि उज्जवला योजना के तहत सब्सिडी मिलेगी, लेकिन 25 से 30 लाख रुपये का खर्च आएगा।
धीरेन्द्र ने हामी भर दी। योगेश ने 18 से 19 लाख रुपये की रकम अपनी मां मूर्ति मिश्रा के बैंक खाते में ली। लंबे समय तक जब एजेंसी नहीं खुली, तो धीरेन्द्र और निशा ने जितेन्द्र पर दबाव बनाया। तब जितेन्द्र और योगेश ने उन्हें एक लाइसेंस और प्रमाणपत्र दिया, लेकिन जब जांच कराई गई, तो वह फर्जी निकला।
















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