मायुस किसानों ने खेतो में छोड़े मवेशी, सोयाबीन की फसल हुई चौपट
कर्ज और खर्च की चिंता से किसान परेशान, कैसे करें रबी की तैयारी
कैसे मनाए त्यौहार, दशहरा रहा फिका दिवाली से पहले निकला किसानों का दिवाला
भावेश नाहर आगर-मालवा
जब सोयाबीन की बुआई हुई थी और सोयाबीन खेतो में लहलहाने लगी थी तो किसानों में एक उम्मीद जागी थी कि इस बार पैदावार बेहतर होगी लेकिन किसानो की मेहनत पर मौसम और बिमारी ने पानी फेर दिया है। खेतो में लहलहाती फसल अचानक पीली पड़ गई और विभिन्न तरह के मोजक जैसे रोग फसल को लग गए जिससे उत्पादन ही प्रभावित हो गया। अब किसानों के हालात बद से बदतर होते जा रहे है। निराश और हताश किसान फसल कटाई कर निकालने की अपेक्षा खेतो में मवेशी छोड़ रहा है। इधर प्रशासनिक स्तर पर सर्वे कार्य शुरू किया जा चुका है लेकिन फिलहाल मुआवजे के संबंध में कोई स्पष्टता सामने नही आई है। कई गांवो में तो सर्वे दल पहुंचा भी नही है। इधर भावांतर योजना को लेकर भी किसानो ने नाराजगी जताई है कि जब उत्पादन ही नही हुआ तो कैसा भावांतर।
किसी जमाने में आगर जिला सोयाबीन की पैदावार में अग्रणी रहता था और यह पीला सोना किसानो की उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करता था लेकिन अब यही सोयाबीन की फसल किसानो को बर्बादी के मुहाने पर लाकर छोड़ रही है। कभी प्राकृतिक आपदा तो कभी कीट का प्रकोप फसल को नष्ट कर रहा है। बेहतर पैदावार की उम्मीद के साथ किसान सोयाबीन की खेती में जुटता है लेकिन इस वर्ष किसानो के अरमान तो चूर-चूर होते है साथ ही किसान अपने आंसू भी नही रोक पा रहे है। इस वर्ष बारिश की खेंच फिर लगातार बारिश और फिर कडक़ धूप, उमस की वजह से लहलहाती सोयाबीन की फसल में पीला मोजक वायरस और इल्ली का प्रकोप इतना अधिक हो गया कि किसान उसे रोकने में असफल रहा। तमाम प्रयास करने के बावजूद किसान अपनी फसल को बचा नही पाया और देखते ही देखते फसल बर्बाद होने लगी। कहीं-कहीं उत्पादन में कमी आई तो कहीं अफलन की स्थिति निर्मित हो गई। जहां किसान एक बीघा पर तीन से चार क्विंटल सोयाबीन का उत्पादन करता था वहीं इस बार थोड़े कमजोर खेत में एक बीघा पर 40 किलो, थोड़े बेहतर खेत में एक क्विंटल तथा बेहतर खेत में सवा क्विंटल उत्पादन ही हुआ है। जिले के किसान घटते उत्पादन की वजह से निराश और हताश हो चुके है। कुछ किसानो ने उम्मीद रखते हुए फसल निकाल तो ली लेकिन उत्पादन से निराश हो गए और कुछ किसानो ने खड़ी फसल में मवेशी छोडऩा ही उचित समझा। सोयाबीन की फसल क्षेत्र में लगातार घांटे का सौदा साबित हो रही है। इस वर्ष स्थिति यह रही कि किसान अपने त्यौहार भी नही मना पा रहे है। किसानो का दशहरा फीका रहा तो दिवाली से पहले ही किसानों का दिवाला निकलता नजर आ रहा है।
खेतो में छोड़े मवेशी
ग्राम फतेहपुर मेंढक़ी के दर्जनो किसानो ने गत् दिवस अपने खेतो में बर्बाद होती फसल के बीच मवेशी छोड़ दिए। इसी तरह के हालात अन्य गांवो में भी दिखाई दिए। खेतो में हरि फसल के बीच मवेशियो का झुंड चरता हुआ नजर आया। किसान घनश्याम शर्मा, कमल शर्मा, गोपाल शर्मा, राजेश, ज्योतिष शर्मा, राधेश्याम शर्मा, रामचंद्र शर्मा, बापूदास बैरागी, बालकृ़ष्ण, हेमा बंजारा, मदनलाल सुरावत, माणक शर्मा, मनोहर शर्मा, रूगनाथ शर्मा, मोहन मालवीय आदि ने बताया कि हमने काफी उम्मीद के साथ फसल बोई थी लेकिन फसल खराब हो गई। कई किसानो ने कर्ज लेकर बुआई की थी। फसल खराब हो गई तो अब मवेशियो को चराने के अलावा कोई चारा नही बचा है। जब मेहनत का फल नही मिला तो मवेशियों को ही खाने दो।
लागत भी नही निकल रही किसानो की
कुछ उन्नत किसानो से चर्चा की गई तो उन्होने बताया कि एक बीघा खेत में सोयाबीन की बुआई से लेकर कटाई तक जो खर्च आता है वह निकलना तो दूर इस बार नुकसान ही हुआ है। करीब 8 हजार 600 रूपए का खर्च एक बीघा पर आया है। यदि चार क्विंटल प्रति बीघा की पैदावार होती है तो ही किसानो को लाभ होता है यदि उत्पादन कम हो जाता है तो सीधे-सीधे नुकसान होने लगता है। इस बार सोयाबीन का भाव 4 हजार रूपए प्रति क्विंटल है और पैदवार बेहद कम है। कहीं 40 किलो प्रति बीघा है तो कहीं एक से सवा क्विंटल की पैदावार हुई है। कुछ ही गांवो में दो क्विंटल से तीन क्विंटल की पैदावार हुई है शेष जिले में स्थिति विकट है।
किसान संघ पहले ही करवा चुका था आगाह
भारतीय किसान संघ द्वारा किसानो की चौपट होती फसल को लेकर जिला मुख्यालय के साथ-साथ सभी तहसील स्तर पर प्रदर्शन करते हुए ज्ञापन सौंपे गए थे और फसल की वस्तुस्थिति से अवगत कराया गया था। किसान संघ पदाधिकारियो का कहना है कि अवगत कराने के बावजूद जिले में महज औपचारिकता ही पुरी हुई है। सर्वे कार्य की पंचायत स्तर पर सूची चस्पा की जानी थी वह भी नही की गई है कई गांवो में सर्वे कार्य महज औपचारिकता के रूप में किया गया है।
एक बीघा के खेत में इस तरह होता है खर्च
खेत में शुरूआती हंकाई खर्च – 1050 रूपए
सोयाबीन 30 किलो बुआई – 1800 रूपए
बुआई ट्रेक्टर खर्च – 300 रूपए
डीएपी खाद – 800 रूपए
बीज उपचार – 150 रूपए
खरपतवार – 200 रूपए
इल्ली व फंगस कीटनाशक – 1100 रूपए
कीटनाशक स्प्रे खर्च – 600 रूपए
फसल कटाई मजदूर खर्च – 1600 रूपए
फसल निकलाई मशीन व मजदूर चार्च – 1000 रूपए
कुल खर्च – 8600 रूपए
सोयाबीन का वर्तमान भाव – 4000 रूपए
औसत उत्पादन – 50 किलो से 1 क्विंटल
औसत नुकसान – लगभग 5000 रूपए
सर्वे कार्य है जारी
‘‘शुरूआती दौर में पानी की खेंच फिर लगातार बारिश, कीट प्रकोप आदि क्षेत्र में हुए है जिससे पैदावार प्रभावित हुई है क्रॉप रोटेशन नही होना भी एक बड़ा कारण सामने आया है क्षेत्र में सर्वे कार्य चल रहा है सर्वे पूर्ण होने के उपरांत ही विस्तृत जानकारी दे पाएंगे -विजय चौरसिया, उप संचालक कृषि’’
भाजपा जिलाध्यक्ष ने की मुआवजे की मांग
‘‘जिले में असमय वर्षा एवं पीला मोजक रोग के कारण फसलें पुरी तरह नष्ट हुई है प्राकृतिक आपदा के कारण किसानो को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है हमारे द्वारा पत्र लिखकर मुख्यमंत्री से मांग की गई है कि क्षेत्र में प्रभावित किसानो को फसल नुकसान का उचित मुआवजा प्रदान किया जाए -ओम मालवीय, भाजपा जिलाध्यक्ष आगर’’
कांग्रेस ने कहा किसानो के साथ हुआ छलावा
‘‘एक ओर किसान प्राकृतिक आपदा झेल रहा है और दूसरी ओर लगातार जिले के किसानो की समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा है जोरशोर के साथ सर्वे कार्य शुरू तो किया गया है लेकिन कई गांवो में सर्वे भी नही हुआ है किसानो के साथ स्पष्ट छलावा किया जा रहा है किसानो को लागत मूल्य के आधार पर खराब हुई फसल का मुआवजा मिलना चाहिए -विजयलक्ष्मी तंवर, जिला कांग्रेस अध्यक्ष आगर’’
आगर -सोयाबीन की फली में नही है दाना
75 प्रतिशत फसल हुई खराब
आगर -खेतो में मवेशी चराते किसानआगर -चौपट हुई फसल दिखाते किसान
‘‘जिले में 75 प्रतिशत फसल खराब हुई है उत्पादन महज 25 प्रतिशत ही है ऐसी स्थिति में भावांतर स्पष्ट रूप से बिचोलिए और व्यापारियों की सांठ-गांठ की योजना बन जाएगी जिले के किसानो को फसल नुकसानी का लागत मूल्य के आधार पर उचित मुआवजा मिलना चाहिए एक बीघा में करीब 8 हजार 600 रूपए का खर्च होता है यदि समय रहते मुआवजा नही मिला तो किसान संघ किसानो के साथ आंदोलन करेगा -रामनारायण तेजरा, जिलाध्यक्ष भारतीय किसान संघ आगर’’